मतदाता सूची लोकतांत्रिक व्यवस्था की महज एक डिजिटल सूची नहीं, बल्कि नागरिक के मताधिकार का आधार है। इसलिए जब मतदाता सूची के प्रबंधन से जुड़े सॉफ्टवेयर और उसके केंद्रीय नियंत्रण पर सवाल उठते हैं तो मामला तकनीकी गड़बड़ी से आगे बढ़कर संवैधानिक और वैधानिक अधिकारों तक पहुंच जाता है। चुनाव आयोग के ECINet और ERONet को लेकर उठे हालिया सवाल इसी वजह से महत्वपूर्ण हैं। इस विवाद के केंद्र में आयोग की डायरेक्टर जनरल (आईटी) सीमा खन्ना की भूमिका भी चर्चा में है।
सीमा खन्ना 2025 में राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) से प्रतिनियुक्ति पर चुनाव आयोग आई थीं। आयोग के आईटी और डिजिटल सिस्टम की जिम्मेदारी उनके अधीन है। 22 जनवरी 2026 को चुनाव आयोग ने ECINet शुरू किया था। इसका उद्देश्य आयोग के 40 से अधिक ऐप और पोर्टल को एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाना था। आयोग ने इसे चुनावी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, सुरक्षित और भरोसेमंद बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया था।
विवाद यह है कि डिजिटल व्यवस्था कहीं उन अधिकारियों के वैधानिक अधिकारों को सीमित तो नहीं कर रही, जिन्हें कानून ने मतदाता सूची तैयार करने और उसमें संशोधन का अधिकार दिया है। Representation of the People Act, 1950 और Registration of Electors Rules, 1960 के तहत प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में नियुक्त Electoral Registration Officer (ERO) को मतदाता सूची से संबंधित दावों और आपत्तियों पर निर्णय लेने तथा नाम जोड़ने, सुधारने और हटाने की जिम्मेदारी दी गई है।
गोवा का मामला इस विवाद का प्रमुख उदाहरण बनकर सामने आया। रिपोर्टों के अनुसार 97 मतदाताओं के मामलों की स्थानीय स्तर पर जांच के बाद उन्हें सूची में शामिल किए जाने योग्य पाया गया। लेकिन पहले हटाए गए नामों को सिस्टम में वापस लाने के लिए आवश्यक तकनीकी सुविधा उपलब्ध नहीं थी। गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने 11 से 17 फरवरी के बीच कई बार चुनाव आयोग से इस तकनीकी समस्या के समाधान और rollback सुविधा की मांग की। इन पत्राचारों में सीमा खन्ना को भी प्रतिलिपि भेजी गई।
मामला यहीं नहीं रुका। रिपोर्टों के मुताबिक, उप निर्वाचन आयुक्त संजय कुमार ने भी आईटी सिस्टम को लेकर चिंता जताई और कहा कि तकनीकी व्यवस्था ERO अथवा AERO की वैधानिक जिम्मेदारियों के निर्वहन में बाधा नहीं बननी चाहिए। इससे यह सवाल और महत्वपूर्ण हो गया कि यदि किसी अधिकारी को कानून निर्णय लेने का अधिकार देता है, लेकिन डिजिटल प्रणाली उसके निर्णय को लागू करने की सुविधा नहीं देती, तो वास्तविक अधिकार किसके पास है?
दिलचस्प बात यह है कि यह चिंता ECINet के औपचारिक लॉन्च से पहले ही आयोग के भीतर उठ चुकी थी। नवंबर 2025 और जनवरी 2026 में भी आयोग के अधिकारियों के बीच इस बात को लेकर पत्राचार हुआ कि ERO, DEO और CEO के वैधानिक अधिकारों को आईटी प्रणाली से प्रभावित नहीं किया जाना चाहिए।
इसके बाद चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की ओर से भी मतदाता सूची के डेटाबेस के बढ़ते केंद्रीयकरण और जमीनी अधिकारियों की डिजिटल पहुंच को लेकर सवाल उठाए गए। रिपोर्टों के अनुसार दोनों आयुक्तों ने यह मुद्दा उठाया कि क्या आईटी विभाग के स्तर पर वैधानिक अधिकारियों की डिजिटल पहुंच सीमित करने का अधिकार है।
हालांकि चुनाव आयोग ने इन आरोपों से अलग अपना पक्ष रखा है। आयोग का कहना है कि ECINet विकेंद्रीकृत व्यवस्था के तहत काम करता है और मतदाता सूची तैयार करने की वैधानिक जिम्मेदारी ERO तथा संबंधित राज्य स्तरीय अधिकारियों के पास ही है। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि गोवा के मामले में Form-7 के जरिए हटाए गए नामों को सीधे rollback करने की सुविधा उपलब्ध नहीं थी। आयोग के अनुसार इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि मतदाता सूची की पूरी प्रक्रिया केंद्रीयकृत कर दी गई है।
इस पूरे विवाद का असली सवाल किसी एक अधिकारी की ताकत नहीं, बल्कि कानून और तकनीक के बीच अधिकार की सीमा है। डिजिटल सिस्टम चुनावी प्रक्रिया को आसान और सुरक्षित बनाने का माध्यम है, लेकिन वह वैधानिक अधिकारों का विकल्प नहीं हो सकता। यदि ERO को कानून ने निर्णय लेने का अधिकार दिया है तो उस निर्णय को लागू करने की तकनीकी क्षमता भी उसके पास होनी चाहिए।
सीमा खन्ना की भूमिका पर उठे सवालों का निष्पक्ष और दस्तावेजी परीक्षण इसलिए जरूरी है। साथ ही ECINet की तकनीकी संरचना, एक्सेस अधिकार, बदलावों के ऑडिट ट्रेल और निर्णय प्रक्रिया की पारदर्शिता भी सार्वजनिक जांच के दायरे में होनी चाहिए।
मतदाता सूची पर भरोसा केवल इस आधार पर नहीं बनता कि वह डिजिटल है। भरोसा तब बनेगा जब यह स्पष्ट हो कि डिजिटल व्यवस्था कानून के अधीन है, कानून से ऊपर नहीं। ECINet विवाद का सबसे बड़ा सबक यही है।