संयुक्त राष्ट्र/न्यूयॉर्क। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने नेपाल के हिमालयी क्षेत्र में तेजी से पिघलते ग्लेशियरों को जलवायु संकट का गंभीर संकेत बताते हुए कहा है कि तीन वर्ष पहले उन्होंने जिस खतरे की चेतावनी दी थी, वह अब वास्तविकता में बदल चुका है। संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र के उद्घाटन संबोधन में मंगलवार को उन्होंने कहा कि हिमालय में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव अनुमान से कहीं अधिक तेजी, गंभीरता और व्यापकता के साथ सामने आ रहे हैं।गुटेरेस ने कहा कि तीन वर्ष पहले नेपाल के हिमालयी क्षेत्र में उन्होंने ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने को लेकर चेताया था। उस समय कुछ लोगों ने इसे खतरे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना बताया था, लेकिन हाल की दुखद घटनाओं ने उस चेतावनी की गंभीरता सामने ला दी है। उनके मुताबिक जलवायु संकट के प्रभाव अब उस गति से दिखाई दे रहे हैं, जिसकी अपेक्षा दुनिया के कई हिस्सों में नहीं की गई थी।उन्होंने जलवायु संकट को केवल पर्यावरणीय समस्या न मानते हुए इसे पीढ़ियों के बीच शक्ति और जिम्मेदारी के असंतुलन से भी जोड़ा। गुटेरेस ने कहा कि जिन देशों और समूहों का वैश्विक प्रदूषण में योगदान सबसे कम है, वे ही जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा खामियाजा भुगत रहे हैं। इसके विपरीत, सबसे अधिक प्रदूषण और उससे जुड़े आर्थिक लाभ लेने वालों को अपने कारण पैदा हुई क्षति की भरपाई के लिए अधिक जिम्मेदारी उठानी होगी।संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने विकसित देशों से जलवायु अनुकूलन के लिए किए गए वित्तीय वादों को पूरा करने और अनुकूलन वित्त को तीन गुना बढ़ाने का आह्वान किया। उन्होंने जलवायु परिवर्तन से होने वाली क्षति और नुकसान के लिए बनाए गए कोष को पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराने तथा उसे प्रभावी ढंग से संचालित करने पर भी जोर दिया।नेपाल लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जलवायु न्याय और जलवायु परिवर्तन से होने वाली क्षति की भरपाई का मुद्दा उठाता रहा है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में नेपाल का योगदान बेहद कम है, लेकिन हिमालयी देश होने के कारण उसे जलवायु परिवर्तन के गंभीर मानवीय और आर्थिक प्रभावों का सामना करना पड़ रहा है।गुटेरेस ने जलवायु संकट को दुनिया के सामने मौजूद प्रमुख चार ‘शक्ति परीक्षणों’ में शामिल करते हुए कहा कि वैश्विक स्तर पर जलवायु न्याय को प्राथमिकता देना अब टाला नहीं जा सकता। हिमालय में बदलते पर्यावरणीय हालात के बीच उनका संदेश केवल नेपाल के लिए नहीं, बल्कि उन सभी देशों के लिए है जो कम उत्सर्जन के बावजूद जलवायु संकट की भारी कीमत चुका रहे हैं।