बारिश बरसे तो बाढ़ नहीं, भविष्य का पानी बचे
पानी की आवाज नहीं होती, लेकिन उसकी कमी बहुत कुछ कहती है। सूखे कुएं, सिकुड़ती नदियां और टैंकरों की कतारें एक तस्वीर हैं, तो दूसरी तस्वीर में कुछ घंटों की बारिश शहरों को डुबो देती है। कहीं पानी की कमी है, कहीं अतिवृष्टि—और दोनों के बीच सबसे बड़ा संकट जल प्रबंधन का है।
नई दिल्ली में 22 से 26 सितंबर तक नौवां भारतीय अंतर्राष्ट्रीय जल सप्ताह ( India water week )आयोजित हो रहा है। ‘जलवायु अनुकूल जल प्रबंधन’ इसकी केंद्रीय थीम है। नीदरलैंड और जर्मनी भागीदार देश हैं तथा 14 राज्य और छह केंद्रीय मंत्रालय एवं विभाग इससे जुड़े हैं। लेकिन किसी सम्मेलन की असली सफलता भाषणों से नहीं, उसके बाद जमीन पर दिखने वाले बदलाव से तय होगी।भारत का जल संकट केवल पानी की मात्रा का प्रश्न नहीं है। बदलता वर्षा-चक्र, भूजल का दबाव, प्रदूषण और असमान वितरण चुनौती को गंभीर बना रहे हैं। जिस बारिश से बाढ़ आती है, वही कुछ समय बाद पानी की कमी में बदल जाती है। इसलिए जरूरत केवल पानी बढ़ाने की नहीं, हर बूंद को सही समय तक सहेजने की है।भारत की पारंपरिक जल-संरचनाएं—तालाब, कुएं, बावड़ियां और जोहड़—इस दिशा में महत्वपूर्ण सबक देती हैं। आधुनिक तकनीक और स्थानीय जल-बुद्धि का मेल भविष्य की जल नीति का आधार बन सकता है। बड़े बांध और पाइपलाइन जरूरी हैं, लेकिन इनके साथ वर्षाजल संचयन, जलग्रहण क्षेत्र का संरक्षण और भूजल पुनर्भरण भी जरूरी है।शहरों में कंक्रीट ने जमीन की पानी सोखने की क्षमता घटाई है। बारिश में जलभराव और गर्मियों में भूजल संकट इसी विरोधाभास की तस्वीर हैं। इसलिए शहरों को केवल स्मार्ट नहीं, वॉटर स्मार्ट बनाना होगा।कृषि में सिंचाई दक्षता, जल-संरक्षण तकनीक और स्थानीय जल उपलब्धता के अनुरूप फसल पद्धति पर जोर देना होगा। किसान से पानी बचाने की अपेक्षा के साथ उसे तकनीक, वित्त और बाजार का सहारा भी देना होगा।जल सुरक्षा का अर्थ साफ और न्यायपूर्ण पानी तक पहुंच भी है। प्रदूषित नदियां और दूषित भूजल स्वास्थ्य तथा अर्थव्यवस्था दोनों को प्रभावित करते हैं। सरकार नीति और ढांचा दे सकती है, लेकिन जल संस्कृति समाज को बनानी होगी।अब जल नीति की कसौटी साफ है—बारिश आए तो पानी बहकर बर्बाद न हो, भूजल निकले तो लौटे, नदियां साफ रहें और हर नागरिक को सुरक्षित पानी मिले।आने वाली पीढ़ी यह नहीं पूछेगी कि हमने कितने जल सम्मेलन किए। वह पूछेगी—जब संकट दिखाई दे रहा था, तब पानी बचाने के लिए हमने किया क्या था?
परमात्मा प्रसाद उपाध्याय
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