फूल-घास से फुटबॉल तक—गेंद किसके पाले में, यह खेल बताएगा!
राजनीति सचमुच फुटबॉल है। फर्क बस इतना है कि फुटबॉल में खिलाड़ी मैदान बदलकर टीम नहीं बदलता, जबकि राजनीति में मैदान वही रहे तो भी टीम बदल सकती है।
राजनीति सचमुच फुटबॉल है। फर्क बस इतना है कि फुटबॉल में खिलाड़ी मैदान बदलकर टीम नहीं बदलता, जबकि राजनीति में मैदान वही रहे तो भी टीम बदल सकती है। ममता बनर्जी की राजनीतिक यात्रा पर नजर डालिए तो कांग्रेस की जर्सी से शुरू हुआ सफर तृणमूल की अपनी टीम तक पहुंचा। फिर कभी भाजपा के साथ पासिंग हुई, कभी कांग्रेस के साथ साझेदारी और बाद में दोनों से अलग बंगाल के मैदान में अपनी टीम लेकर उतरना पड़ा।अब निर्वाचन आयोग से मिला ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ चुनाव चिह्न इस पूरे सफर पर जैसे प्रकृति का अपना व्यंग्य है।कभी पहचान थी—फूल और घास। अब खिलाड़ी मैदान में है। फूल-घास में ठहराव का भाव था, फुटबॉल खिलाड़ी में दौड़ का। और राजनीति में दौड़ का मतलब समझने के लिए किसी शब्दकोश की जरूरत नहीं—आज गेंद अपने पास है तो कल किसी और के पैर में भी हो सकती है।ममता कांग्रेस से निकलीं तो अपनी टीम बनाई। फिर केंद्र की सत्ता के मैदान में भाजपा के एनडीए के साथ खेला। रेल मंत्रालय तक पहुंचीं। समय बदला तो कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए के साथ भी सत्ता की साझेदारी हुई। जिस कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल बनी थी, उसके साथ सत्ता साझा करना भारतीय गठबंधन राजनीति की वही तस्वीर थी जिसमें कल का अलगाव आज की साझेदारी में बदल जाता है।फिर कहानी ने करवट ली। बंगाल में भाजपा और तृणमूल आमने-सामने आ गए। राजनीति का कमाल देखिए—जिसके साथ कभी सरकार चलाने के लिए पास दिया गया था, उसी के खिलाफ चुनावी मैदान सज गया।गुरु जी पूछते हैं—यह फुटबॉल है या गठबंधन एक्सप्रेस?खैर, राजनीति में स्थायी दोस्ती और स्थायी दुश्मनी का फार्मूला शायद चुनावी कैलेंडर से चलता है। पांच साल की किताब में अध्याय बदलते रहते हैं, मगर जनता का पन्ना वहीं रहता है।फुटबॉल खिलाड़ी को हर क्षण देखना पड़ता है कि गेंद किसके पास है। ज्यादा देर गेंद रोक ली तो विपक्षी खिलाड़ी घेर लेते हैं। बहुत तेज दौड़े तो ऑफसाइड का खतरा। गलत दिशा में पास दिया तो अपना ही खिलाड़ी परेशान।ममता की राजनीति का इतिहास भी ऐसे ही कई पासों और कई मैदानों से होकर गुजरा है।लेकिन असली मजा यहां है—चुनाव चिह्न खिलाड़ी को मिला है, मगर खेल जनता खेलेगी नहीं; वह केवल देखेगी, फिर अपना फैसला सुनाएगी।मैदान में खिलाड़ी कितनी भी तेज दौड़े, गोलपोस्ट कितना भी आकर्षक हो, अंत में स्कोरबोर्ड ही इतिहास लिखता है।इसलिए गुरु जी की कलम कहती है—फूल बदला, घास बदली या खिलाड़ी बदला—यह चुनावी प्रतीक की कहानी है।गेंद किसके पाले में गई, यह गठबंधन की कहानी है।लेकिन सीटी बजने के बाद स्कोर क्या रहा—यही लोकतंत्र की असली कहानी होगी।
परमात्मा प्रसाद उपाध्याय
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