दूरदृष्टि और पक्के इरादे का जमाना है। राजनीति में दूरदृष्टि हो तो नेता आज की जरूरत से आगे देखकर कल की तैयारी करता है। अब अगर प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर देशभर में तेल के दीये जलाने हों, तो तेल की जरूरत तो पड़ेगी ही। ऐसी स्थिति में दूरदृष्टि का तकाजा यही कहता है कि जनता को महीनों पहले समझा दिया जाए—खाद्य तेल कम इस्तेमाल कीजिए। आखिर रसोई में तेल खर्च होगा तो दीये में क्या जलेगा?
यह व्यंग्य है, लेकिन सवाल असली है।
जन्मदिन मनाना किसी भी व्यक्ति या समर्थक समूह का लोकतांत्रिक अधिकार है। किसी नेता के प्रति सम्मान या उत्साह व्यक्त करने के अपने तरीके हो सकते हैं। लेकिन जब उत्सव की चमक को जनजीवन की कठिनाइयों के बरक्स देखा जाता है, तो सवाल अपने आप पैदा होते हैं। जिस रसोई में तेल रोजमर्रा की जरूरत है, वहां उसकी बचत की सलाह और उसी तेल से उत्सव का उजाला—दोनों तस्वीरें एक साथ दिखाई देने लगें तो व्यंग्य के लिए सामग्री अपने आप तैयार हो जाती है।
राजनीति में प्रतीक बहुत मायने रखते हैं। कभी झाड़ू प्रतीक बनती है, कभी चाय, कभी मिट्टी का दीपक और कभी कोई बड़ा अभियान। प्रतीक जनता की भावनाओं से जुड़ते हैं, इसलिए उनका राजनीतिक प्रभाव भी होता है। मगर प्रतीक की रोशनी तभी ज्यादा अर्थपूर्ण लगती है, जब उसके पीछे आम आदमी की जिंदगी भी थोड़ी आसान हो।
वरना सवाल वही रहेगा—दीया कितना बड़ा था और रसोई कितनी छोटी?
सरकारें अक्सर बचत, संयम और जिम्मेदारी की अपील करती हैं। ऐसी अपीलें अपने आप में गलत नहीं हैं। पानी बचाइए, बिजली बचाइए, ईंधन बचाइए, खाद्य तेल बचाइए—हर बचत का अपना महत्व है। लेकिन जनता का एक पुराना सवाल भी है: बचत की सलाह हमेशा रसोई और महिलाओ से ही क्यों शुरू होती है?
अगर तेल बचाना राष्ट्रीय जिम्मेदारी है तो खाद्य तेल की कीमत, किसानों की लागत, आयात पर निर्भरता और आपूर्ति व्यवस्था भी उतनी ही बड़ी चर्चा के विषय होने चाहिए। अगर बिजली बचानी है तो ऊर्जा दक्षता पर गंभीर नीति चाहिए। अगर ईंधन बचाना है तो सार्वजनिक परिवहन और वैकल्पिक ऊर्जा पर उतना ही जोर चाहिए। यानी अपील के साथ व्यवस्था भी चाहिए।
और यही राजनीति की असली परीक्षा है।
जन्मदिन आएगा, दीये जलेंगे, रोशनी होगी, नारे लगेंगे और समर्थक अपनी भावनाएं व्यक्त करेंगे। अगले दिन दीये बुझ जाएंगे और देश फिर अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में लौट जाएगा। वहीं किसी घर में गृहिणी तेल की बोतल देखकर हिसाब लगाएगी कि महीने का बजट कैसे चलेगा।
इसलिए जन्मदिन की सबसे सुंदर रोशनी शायद वही होगी, जो सिर्फ दीयों में नहीं, जनता की रसोई, किसान की आमदनी और परिवार के बजट में भी दिखाई दे।
दूरदृष्टि का अर्थ केवल आने वाले उत्सव के लिए महीनों पहले तेल बचाना नहीं हो सकता। दूरदृष्टि तो वह होगी, जिसमें ऐसी व्यवस्था बने कि दीया भी जले और चूल्हा भी।
क्योंकि लोकतंत्र में असली उजाला वही है, जिसमें सत्ता का मंच भी रोशन हो और आम आदमी का घर भी।
दीयों के लिए तेल, रसोई के लिए दूरदृष्टि जन्मदिन के उजाले में महंगाई की रसोई का अंधेरा
दीयों के लिए तेल, रसोई के लिए दूरदृष्टिजन्मदिन के उजाले में महंगाई की रसोई का अंधेरा
परमात्मा प्रसाद उपाध्याय
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