हिंदी की ताकत ताज में नहीं, संवाद में है
हिंदी की ताकत ताज में नहीं, संवाद में है: हिंदी दिवस पर विशेष
हिंदी दिवस पर हर वर्ष सरकारी कार्यालयों में हिंदी के प्रयोग का संकल्प लिया जाता है, प्रतियोगिताएं होती हैं और भाषण दिए जाते हैं। फिर अगले दिन व्यवस्था पुराने ढर्रे पर लौट आती है। ऐसे में सवाल यह नहीं कि हिंदी महान है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या उसे ज्ञान, विज्ञान, तकनीक, प्रशासन, न्याय और रोजगार की सक्षम भाषा बनाने के लिए पर्याप्त प्रयास हो रहे हैं?हिंदी दिवस केवल उत्सव का अवसर नहीं, आत्ममंथन का दिन होना चाहिए। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने भी हिंदी को अन्य भारतीय भाषाओं की प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि उनके बीच संवाद और राष्ट्रीय एकात्मता की महत्वपूर्ण कड़ी बताया है। यही दृष्टि हिंदी के भविष्य की सही दिशा हो सकती है।भारत की भाषाई शक्ति उसकी विविधता में है। तमिल, संस्कृत, बांग्ला, मराठी, गुजराती, पंजाबी, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, उर्दू और अनेक भाषाओं ने भारतीय संस्कृति और ज्ञान परंपरा को समृद्ध किया है। हिंदी इसी विराट भाषाई परिवार की एक सशक्त धारा है। इसलिए हिंदी का विस्तार दूसरी भाषाओं के सम्मान के साथ होना चाहिए। भाषा आदेश से नहीं, आत्मीयता और उपयोगिता से स्वीकार की जाती है।आज हिंदी के सामने चुनौती अंग्रेजी को हटाने की नहीं, बल्कि अपनी क्षमता बढ़ाने की है। उच्च शिक्षा, विज्ञान और तकनीक में हिंदी की गुणवत्तापूर्ण सामग्री, आधुनिक शब्दावली, अच्छे अनुवाद और डिजिटल संसाधनों का विस्तार जरूरी है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मशीन अनुवाद और वाक् पहचान जैसी तकनीकें इसमें नई संभावनाएं पैदा कर रही हैं। लेकिन इसके लिए बड़े और गुणवत्तापूर्ण भाषाई डाटाबेस तथा निरंतर शोध की आवश्यकता होगी।हिंदी की शक्ति केवल बोलने वालों की संख्या में नहीं, बल्कि उसकी उपयोगिता में बढ़नी चाहिए। उसे विज्ञान, चिकित्सा, कानून, तकनीक और आधुनिक अर्थव्यवस्था की भाषा बनाना होगा। साथ ही यह भी समझना होगा कि भाषाई एकता का अर्थ भाषाई एकरूपता नहीं है।2047 के विकसित भारत में किसी बच्चे की प्रतिभा भाषा की बाधा से पीछे न रहे और किसी नागरिक को सरकारी व्यवस्था समझने के लिए अपनी भाषा छोड़ने की मजबूरी न हो—यही भाषा नीति की कसौटी होनी चाहिए।हिंदी को किसी भाषा का प्रतिद्वंद्वी नहीं, भारतीय भाषाओं के बीच संवाद का सेतु बनना होगा। उसका भविष्य समारोहों से नहीं, ज्ञान, अवसर और संवाद से तय होगा।हिंदी को ताज नहीं, विश्वास और क्षमता चाहिए। यही उसकी असली ताकत है।
परमात्मा प्रसाद उपाध्याय
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