सिद्धार्थनगर l नगर पंचायत बढ़नी क्षेत्र में नशे के कारोबार को लेकर लगातार चर्चाएं सामने आ रही हैं। स्मैक, नशीले इंजेक्शन और प्रतिबंधित मादक पदार्थों की कथित बिक्री की बातें आम हैं। इससे यह सवाल उठता है कि जिन गतिविधियों की जानकारी स्थानीय लोगों को है, उन पर पुलिस की प्रभावी निगरानी कब सुनिश्चित होगी?
ढेबरुआ थाना क्षेत्र में पुलिस गश्त, बैठकें और नशे के खिलाफ निर्देश जारी किए जाते हैं। व्यवस्था के स्तर पर प्रयास दिखाई देते हैं, लेकिन यदि कथित धंधेबाजों के खिलाफ ठोस कार्रवाई नजर नहीं आती, तो इन प्रयासों की प्रभावशीलता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
उच्च स्तर से नशे के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति के निर्देश दिए जाते हैं। यदि इसके बावजूद नशे का कारोबार जारी रहने की शिकायतें सामने आती रहें, तो प्रशासन को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। जनता को यह जानने का अधिकार है कि शिकायतों पर क्या कार्रवाई की जा रही है।
पुलिस के पास जांच, शिकायतों की पड़ताल, संदिग्ध गतिविधियों पर निगरानी और कानून के तहत कार्रवाई के पर्याप्त अधिकार हैं। ऐसे में यदि लोगों की शिकायतें लगातार सामने आती रहें और पुलिस की ओर से कोई स्पष्ट कार्रवाई दिखाई न दे, तो जवाबदेही तय करने की मांग स्वाभाविक है।
यदि शिकायतें निराधार हैं, तो पुलिस को सार्वजनिक रूप से स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। यह बताया जाना चाहिए कि किन आरोपों की जांच की गई और उसका परिणाम क्या रहा। इससे पुलिस की विश्वसनीयता मजबूत होगी। वहीं, यदि शिकायतों में तथ्य हैं, तो तत्काल कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए। कानून में कार्रवाई के लिए अनिश्चितकाल तक प्रतीक्षा करने का कोई प्रावधान नहीं है।
सीमा क्षेत्र होने के कारण यह मामला और अधिक गंभीर हो जाता है। यहां नशे की छोटी-सी खेप भी केवल अपराध का विषय नहीं, बल्कि युवाओं के भविष्य और क्षेत्र की सुरक्षा से जुड़ा प्रश्न बन सकती है। जिस उम्र में युवाओं के हाथों में किताब, कौशल या रोजगार होना चाहिए, वहां नशीले पदार्थ पहुंचना पूरे समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
लेकिन चिंता से अधिक आवश्यक है जवाबदेही।
पुलिस की सफलता का आकलन बैठकों की संख्या से नहीं, बल्कि कार्रवाई के परिणामों से होना चाहिए। कितने संदिग्ध ठिकानों की जांच हुई? कितने नेटवर्क का पता चला? नशीले पदार्थों की आपूर्ति कहां से होती है? पुराने मामलों में जेल जा चुके आरोपियों की गतिविधियों पर निगरानी रखी जा रही है या नहीं? शिकायतों पर क्या कार्रवाई की गई?
यदि इन सवालों के स्पष्ट उत्तर हैं, तो उन्हें जनता के सामने रखा जाना चाहिए। यदि उत्तर उपलब्ध नहीं हैं, तो यह पूछना भी उचित होगा कि नशे की निगरानी में पुलिस की समस्या संसाधनों की है या इच्छाशक्ति की?
अपराधियों का बेखौफ होना जितना चिंताजनक है, उससे अधिक गंभीर स्थिति तब होती है जब जनता यह मानने लगे कि शिकायत करने से कोई बदलाव नहीं आएगा।
नशे के खिलाफ लड़ाई में पुलिस को केवल यह साबित नहीं करना कि वह कार्रवाई कर सकती है। उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वह समय रहते संदिग्ध गतिविधियों की पहचान करे, प्रभावी निगरानी रखे और त्वरित कार्रवाई करे।
अन्यथा सवाल केवल नशे के कारोबार तक सीमित नहीं रहेगा। तब यह भी पूछा जाएगा कि नशे का कारोबार कौन चला रहा है और उसकी जानकारी पुलिस तक कौन पहुंचाएगा—जनता, मुखबिर या अगली बैठक का एजेंडा?
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