देश में नशीले पदार्थों की तस्करी अब केवल कानून-व्यवस्था की चुनौती नहीं रह गई है। यह संगठित अपराध, अवैध वित्तीय नेटवर्क, सीमा सुरक्षा और युवा पीढ़ी के भविष्य से जुड़ा गंभीर संकट बन चुकी है। हाल में राजस्व खुफिया निदेशालय (डीआरआई) की कार्रवाई इसका एक और चिंताजनक चेहरा सामने लाती है। डीआरआई के अनुसार पिछले पखवाड़े में देश के विभिन्न हिस्सों में आठ महत्वपूर्ण अभियानों के दौरान करीब 740 किलोग्राम गांजा, उच्च गुणवत्ता वाली हाइड्रोपोनिक कैनाबिस और चरस बरामद की गई तथा एनडीपीएस अधिनियम के तहत 13 लोगों को गिरफ्तार किया गया। यह कार्रवाई निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन इससे भी बड़ा सवाल यह है कि आखिर इतनी बड़ी मात्रा में मादक पदार्थ देश के भीतर पहुंच कैसे रहे हैं और इनके पीछे काम करने वाला नेटवर्क कितना गहरा है?रायपुर के पास दो ट्रकों से 375.95 किलोग्राम गांजा बरामद होना बताता है कि सड़क मार्ग अब भी तस्करों का प्रमुख माध्यम बना हुआ है। एक अन्य मामले में ट्रक से करीब 124 किलोग्राम गांजा बरामद हुआ। पटना के निकट एक अन्य कार्रवाई में चालक दल के हमले के बावजूद डीआरआई अधिकारियों ने वाहन की तलाशी लेकर चालक की केबिन के पीछे बने गुप्त स्थान से 140.5 किलोग्राम गांजा बरामद किया। लुधियाना के पास वाहन के फर्श में बनाए गए विशेष खोखलों में छिपाकर रखे गए करीब 69 किलोग्राम मादक पदार्थ की बरामदगी भी इसी ओर संकेत करती है कि तस्कर सामान्य परिवहन व्यवस्था का इस्तेमाल करते हुए जांच एजेंसियों को चकमा देने के लिए लगातार नए तरीके अपना रहे हैं।सबसे गंभीर पहलू यह है कि तस्करी का नेटवर्क केवल सड़क तक सीमित नहीं है। रेल मार्ग और हवाई अड्डे भी इसके निशाने पर हैं। गोरखपुर रेलवे स्टेशन पर अमरनाथ एक्सप्रेस से तीन लोगों के पास से करीब पांच किलोग्राम चरस बरामद होने की घटना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि डीआरआई के अनुसार इसकी तस्करी नेपाल से की गई थी। दूसरी ओर हैदराबाद और बेंगलुरु हवाई अड्डों पर हनोई और बैंकॉक से आने वाले यात्रियों के माध्यम से उच्च क्षमता वाली कैनाबिस की खेप पकड़ी गई। इसका अर्थ साफ है कि तस्करी का भूगोल स्थानीय सीमाओं से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मार्गों तक फैल चुका है।ऐसे में केवल बरामदगी और गिरफ्तारी को सफलता का अंतिम पैमाना मान लेना पर्याप्त नहीं होगा। हर पकड़ी गई खेप के पीछे कोई स्रोत है, कोई वित्तपोषक है, कोई परिवहनकर्ता है, कोई संपर्क सूत्र है और अंततः कोई वितरण तंत्र है। यदि कार्रवाई केवल उस व्यक्ति तक सीमित रहती है जो खेप लेकर जा रहा था, तो तस्करी का वास्तविक संचालक पर्दे के पीछे सुरक्षित रह सकता है। कानून का उद्देश्य केवल वाहक को पकड़ना नहीं, बल्कि पूरे आपूर्ति तंत्र को ध्वस्त करना होना चाहिए।यहीं जांच एजेंसियों के सामने सबसे कठिन लेकिन सबसे जरूरी काम शुरू होता है। बरामद मादक पदार्थ की उत्पत्ति कहां से हुई? उसे खरीदने के लिए धन किसने उपलब्ध कराया? वाहन की व्यवस्था किसने की? मार्ग किसने तय किया? मोबाइल फोन और डिजिटल संचार के जरिए किन लोगों से संपर्क हुआ? खेप किस शहर या व्यक्ति तक पहुंचनी थी? भुगतान किस माध्यम से होना था? इन सवालों के जवाब तस्करी की असली जड़ तक पहुंचा सकते हैं। इसलिए प्रत्येक बड़ी बरामदगी के साथ वित्तीय जांच को अनिवार्य रूप से जोड़ा जाना चाहिए।नशे के कारोबार का आर्थिक पक्ष अक्सर उसकी सबसे मजबूत कड़ी होता है। अवैध व्यापार तब तक फलता-फूलता रहेगा, जब तक उसमें पैसा लगाने और उससे लाभ कमाने वालों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं होगी। बैंक खातों, संदिग्ध डिजिटल लेन-देन, संपत्तियों, फर्जी कंपनियों, हवाला जैसे संभावित वित्तीय माध्यमों और बेनामी लेन-देन की जांच तस्करी के नेटवर्क को कमजोर करने में निर्णायक साबित हो सकती है। जब तक अपराध से अर्जित धन सुरक्षित रहेगा, तब तक नए लोग इस कारोबार में आते रहेंगे और पकड़े गए वाहकों की जगह नए चेहरे तैयार होते रहेंगे।नेपाल से जुड़े मार्गों के संदर्भ में यह चुनौती और भी संवेदनशील हो जाती है। भारत-नेपाल सीमा के अनेक हिस्सों में सामाजिक और आर्थिक आवाजाही सामान्य जीवन का हिस्सा है। ऐसे में सुरक्षा व्यवस्था को इस तरह मजबूत करना होगा कि वैध आवागमन बाधित न हो, लेकिन तस्करी के लिए सीमा का इस्तेमाल भी न होने पाए। इसके लिए स्थानीय पुलिस, सशस्त्र सीमा बल, रेलवे सुरक्षा तंत्र, कस्टम, डीआरआई और अन्य संबंधित एजेंसियों के बीच वास्तविक समय में सूचना साझा करने की व्यवस्था जरूरी है। अलग-अलग एजेंसियों के पास अलग-अलग सूचनाएं हों और वे आपस में जुड़ न पाएं तो अपराधी इसी खामी का फायदा उठाते हैं।तकनीक इस लड़ाई में बड़ा हथियार बन सकती है। संदिग्ध वाहनों की आवाजाही, बार-बार इस्तेमाल होने वाले मार्ग, यात्रियों के यात्रा-पैटर्न, संचार नेटवर्क और वित्तीय गतिविधियों का वैधानिक तरीके से विश्लेषण करके उन कड़ियों तक पहुंचा जा सकता है जो सामान्य तलाशी में दिखाई नहीं देतीं। लेकिन तकनीक के साथ कानूनी प्रक्रिया और नागरिक अधिकारों का संतुलन भी उतना ही जरूरी है। किसी व्यक्ति को केवल संदेह के आधार पर अपराधी मान लेना जांच की विश्वसनीयता को कमजोर कर सकता है। गिरफ्तार व्यक्ति आरोपी है; दोष सिद्धि न्यायालय की प्रक्रिया से ही होगी। इसलिए मादक पदार्थों के खिलाफ कठोर कार्रवाई के साथ निष्पक्ष और प्रमाण-आधारित जांच भी अनिवार्य है।लेकिन नशे के खिलाफ लड़ाई केवल पुलिस और जांच एजेंसियों के भरोसे नहीं जीती जा सकती। तस्करी का एक पक्ष आपूर्ति है और दूसरा मांग। जब तक नशे के लिए बाजार मौजूद रहेगा, तब तक अपराधी नई आपूर्ति श्रृंखलाएं खड़ी करते रहेंगे। इसलिए युवाओं के बीच जागरूकता, विद्यालयों और महाविद्यालयों में प्रभावी नशा-विरोधी कार्यक्रम, खेल और कौशल विकास के अवसर, परिवारों की भूमिका तथा नशा मुक्ति और पुनर्वास सेवाओं को मजबूत करना भी जरूरी है।यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना होगा। नशे की लत से जूझ रहे व्यक्ति और नशीले पदार्थों के संगठित कारोबार से जुड़े अपराधी को एक ही नजर से नहीं देखा जा सकता। तस्करी करने वाले संगठित नेटवर्क के खिलाफ कानून का कठोर हाथ जरूरी है, जबकि नशे की गिरफ्त में आए व्यक्ति के लिए उपचार, परामर्श और पुनर्वास की व्यवस्था चाहिए। समाज को अपराध से कठोरता और पीड़ित व्यक्ति से संवेदनशीलता—दोनों साथ लेकर चलना होगा।डीआरआई की हालिया कार्रवाई ने यह साबित किया है कि एजेंसियां तस्करों के बदलते तौर-तरीकों को पहचान रही हैं और सड़क, रेल तथा हवाई मार्गों पर कार्रवाई कर रही हैं। लेकिन हर बड़ी बरामदगी के बाद अगले स्तर की जांच का सवाल उठना चाहिए। यदि एक ट्रक पकड़ा गया है तो उसके पीछे कितने ट्रक चल रहे हैं? यदि एक यात्री पकड़ा गया है तो उसे भेजने वाला कौन है? यदि एक वित्तीय लेन-देन संदिग्ध है तो उससे जुड़े दूसरे खाते कहां हैं? और यदि एक सीमा मार्ग का इस्तेमाल हुआ है तो उस मार्ग को संचालित करने वाला नेटवर्क कितना बड़ा है?सरकार को मादक पदार्थों के खिलाफ अभियान को केवल छापेमारी और बरामदगी तक सीमित रखने के बजाय एक समन्वित राष्ट्रीय रणनीति का रूप देना होगा। सीमा क्षेत्रों में खुफिया तंत्र मजबूत हो, जांच एजेंसियों के बीच डेटा और सूचना का त्वरित आदान-प्रदान हो, वित्तीय जांच को हर बड़े मामले का हिस्सा बनाया जाए, अंतरराष्ट्रीय मार्गों पर निगरानी बढ़े और अभियोजन को इतना मजबूत किया जाए कि गंभीर मामलों में दोष सिद्धि सुनिश्चित हो सके। साथ ही यह भी देखा जाए कि लंबी कानूनी प्रक्रिया के कारण बरामदगी और जांच का प्रभाव कमजोर न पड़े।नशे के खिलाफ लड़ाई वास्तव में देश के भविष्य की लड़ाई है। आज तस्करी की एक खेप किसी शहर में पहुंचती है तो उसका असर केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रहता। वह परिवारों को तोड़ सकती है, युवाओं की क्षमता को नष्ट कर सकती है, अपराध को बढ़ावा दे सकती है और अवैध अर्थव्यवस्था को मजबूत कर सकती है। इसलिए इस चुनौती को केवल ‘एक और तस्करी का मामला’ समझना खतरनाक भूल होगी।डीआरआई की कार्रवाई स्वागतयोग्य है, लेकिन असली सफलता तब होगी जब बरामद गांजे या चरस के साथ उस नेटवर्क का नक्शा भी सामने आए जिसने उसे भेजा, पैसा लगाया, रास्ता उपलब्ध कराया और बाजार तक पहुंचाने की योजना बनाई। नशे की एक खेप पकड़ना उपलब्धि है, लेकिन उसके पीछे छिपे पूरे तंत्र को ध्वस्त करना असली जीत है। अब समय है कि जांच की दिशा केवल ‘माल कहां मिला’ से आगे बढ़कर ‘माल किसका था, पैसा किसका था और आदेश किसका था’ तक पहुंचे। तस्कर का चेहरा बदल सकता है, रास्ता बदल सकता है, वाहन बदल सकता है, लेकिन यदि धन और नेटवर्क की जड़ पकड़ ली जाए तो इस पूरे साम्राज्य को कमजोर किया जा सकता है। देश को अब केवल वाहक पकड़ने वाली कार्रवाई नहीं, बल्कि संचालक, वित्तपोषक और वितरण तंत्र तक पहुंचने वाली निर्णायक कार्रवाई चाहिए। यही नशामुक्त भारत की दिशा में वास्तविक और स्थायी कदम होगा।