लखनऊ, 3 सितंबर। उत्तर प्रदेश में गो-संरक्षण को ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़ने की दिशा में नई पहल शुरू की गई है। गोशालाओं में उपलब्ध गोबर को स्वच्छ ऊर्जा, जैविक खाद और आय के संसाधन में बदलने के लिए उत्तर प्रदेश गोसेवा आयोग और ‘पार्टनर्स इन प्रॉसपेरिटी’ (पीएनपी) के बीच तकनीकी सहयोग का समझौता हुआ है। इसके तहत दीनबंधु मॉडल बायोगैस संयंत्रों को तकनीकी सहायता देने के साथ प्रदेश में करीब 1,000 तकनीकी विशेषज्ञ कर्मियों का नेटवर्क तैयार किया जाएगा।
यह नेटवर्क बायोगैस संयंत्रों की स्थापना, संचालन, रखरखाव, तकनीकी प्रशिक्षण और फील्ड मॉनिटरिंग में सहयोग करेगा। इसका उद्देश्य संयंत्र स्थापित होने के बाद भी उन्हें नियमित और प्रभावी ढंग से संचालित करने के लिए स्थानीय स्तर पर तकनीकी सहायता उपलब्ध कराना है। संस्था के मुताबिक उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में अब तक 3,900 से अधिक दीनबंधु बायोगैस इकाइयों के निर्माण में सहयोग किया जा चुका है।
इस पहल के तहत गोबर से बायोगैस बनाने के बाद निकलने वाली जैव-स्लरी को जैविक खाद और बायो-इनपुट के रूप में खेतों तक पहुंचाने की योजना है। इससे प्राकृतिक और पुनर्योजी खेती को बढ़ावा मिलने के साथ रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने की संभावनाएं बढ़ेंगी। भविष्य में इस मॉडल को कार्बन परियोजनाओं और पर्यावरणीय लाभ से जोड़ने की भी तैयारी है।
गोसेवा आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्ता ने कहा कि गोबर को अपशिष्ट नहीं, बल्कि ऊर्जा, जैविक कृषि और ग्रामीण आय का महत्वपूर्ण संसाधन मानकर उपयोग करने की जरूरत है। सरकार का लक्ष्य गोशालाओं को आत्मनिर्भर बनाते हुए गो-संरक्षण को रोजगार और ग्रामीण समृद्धि से जोड़ना है।