बुधवार, 26 अगस्त 2026 की सुबह नेपाल और चीन के तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र की सीमा पर भोटेकोशी-त्रिशूली नदी गलियारे में एक विनाशकारी बाढ़ आ गई। हिमालय में अत्यधिक ऊंचाई पर एक ग्लेशियर के ढहने और उससे जुड़े बर्फ-चट्टान के भूस्खलन के कारण कीचड़, बर्फ और मलबे का एक भयंकर सैलाब आया। इसने नेपाल के रसुवा और नुवाकोट जिलों में गांवों, पुलों, जलविद्युत स्टेशनों और एक प्रमुख व्यापारिक राजमार्ग को पूरी तरह से तबाह कर दिया। इसके बाद यह सैलाब त्रिशूली और नारायणी नदियों के माध्यम से धादिंग, गोरखा, तनाहुन, चितवन और दोनों नवलपरासी जिलों में नीचे की ओर बढ़ता गया। नेपाल के राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण (NDRRMA) और प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार, इस आपदा की शुरुआत कोडारी से लगभग 55 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में तिब्बती सीमा पर 5,000 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर स्थित पुरेपु ग्लेशियर प्रणाली के ढहने से हुई। इसके ढहने से बर्फ और चट्टानों का एक बड़ा भूस्खलन हुआ जो एक हिमनद-झील और नदी के चैनल में जा गिरा। अमेरिकी भूगर्भीय सर्वेक्षण (USGS) के अनुसार, इससे उत्पन्न सैलाब इतना शक्तिशाली था कि स्थानीय निगरानी स्टेशनों पर 5.2 तीव्रता का भूकंपीय संकेत दर्ज किया गया। यह घटना नेपाली समयानुसार सुबह लगभग 8:37 बजे हुई। शुरुआती रिपोर्टों में इस भूकंपीय संकेत को एक स्वतंत्र भूकंप समझ लिया गया था, और USGS ने उसी सुबह काठमांडू से लगभग 100 किलोमीटर उत्तर में चीन सीमा के पास 4.4 तीव्रता के झटके दर्ज किए थे, जिससे शुरुआती भ्रम और बढ़ गया। यह सैलाब भोटेकोशी नदी की सहायक नदी ल्हेन्डे खोला से होता हुआ त्रिशूली नदी में प्रवेश कर गया और रसुवा एवं नुवाकोट जिलों के टिमुरे, स्याफ्रुबेसी, धुंचे, बेत्रावती और बिदुर कस्बों को बहा ले गया।  नेपाल में मानसून के दौरान आने वाली कई आपदाओं के विपरीत, इस बाढ़ से पहले स्थानीय स्तर पर भारी बारिश नहीं हुई थी। पत्रकारों के अनुसार, जब बिना किसी चेतावनी के कीचड़ और पानी की तेज दीवार आई, तो कई लोग घरों के अंदर ही फंस गए और उन्हें संभलने का मौका नहीं मिला। ढलान बहुत ज़्यादा थी, इसलिए रफ़्तार बहुत तेज़ और विनाशकारी थी।

बुनियादी ढांचा और आर्थिक नुकसान
बाढ़ ने प्रभावित गलियारे में नेपाल के ऊर्जा, परिवहन और वित्तीय ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया। नेपाल के ऊर्जा मंत्रालय और नेपाल बिजली प्राधिकरण ने बताया कि छह प्रमुख जलविद्युत और ट्रांसमिशन सुविधाएं क्षतिग्रस्त हो गईं: रसुवागढ़ी, चिलिमे, और त्रिशूली 3A जलविद्युत परियोजनाएं, त्रिशूली 3B हब 220 kV सबस्टेशन, त्रिशूली जलविद्युत स्टेशन, और देवीघाट जलविद्युत स्टेशन। कुल मिलाकर, अधिकारियों का अनुमान है कि लगभग 430 मेगावाट उत्पादन क्षमता प्रभावित हुई है, जो नेपाल की कुल स्थापित क्षमता का लगभग आठवां हिस्सा (1/8) है। इससे कई जिलों में बिजली की आपूर्ति बाधित हुई। नेपाल के सड़क विभाग ने पुष्टि की कि नुवाकोट के बेत्रावती को रसुवागढ़ी सीमा पार करने वाले पूरे 42 किलोमीटर लंबे मार्ग कई स्थानों पर नष्ट  हो गया है। इसमें कई कंक्रीट के पुल शामिल हैं। इसके अलावा सीमा के पास के 16 किलोमीटर लंबे हिस्से को भी नुकसान पहुंचा है जिसे हाल ही में चीनी सरकार के वित्तपोषण से अपग्रेड किया गया था। यह गलियारा तिब्बत के लिए नेपाल का मुख्य ओवरलैंड व्यापार और तीर्थयात्रा मार्ग है। इसके नष्ट होने से बचावकर्मियों को सड़क वाहनों के बजाय पूरी तरह से हेलीकॉप्टरों पर निर्भर होना पड़ा है। काठमांडू को देश के बाकी हिस्सों और भारत से जोड़ने वाली मुख्य सड़क, पृथ्वी राजमार्ग पर गुरुवार दोपहर सन्नाटा देखा गया क्योंकि अधिकारियों ने प्रभावित नदी के किनारों के पास आवाजाही को प्रतिबंधित कर दिया था। नेपाल सरकार ने भोटेकोशी, त्रिशूली और नारायणी नदियों के किनारे रहने वाले निवासियों को मलबे के बहाव के खतरे को देखते हुए तटों से दूर रहने का आग्रह किया है।  


ग्लेशियर और मानसून से जुड़ी बाढ़ आपदा 
26 अगस्त 2026 की यह घटना ग्लेशियर और मानसून से जुड़ी बाढ़ आपदाओं की श्रृंखला में सबसे नई और मौतों के मामले में सबसे गंभीर है। हालांकि काठमांडू स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) के अधिकारियों ने कहा कि नदी का यही हिस्सा (ल्हेन्डे खोला) पिछले 14 महीनों में पहले भी एक बार जलमग्न हो चुका था। यह जुलाई 2025 में आई इसी तरह की एक हिमनद झील विस्फोट बाढ़ (GLOF) का संदर्भ था, जिसने रसुवागढ़ी सीमा पर नेपाल-चीन मैत्री पुल को नष्ट कर दिया था। जुलाई 2025 में, गोंगबातोंगशा ग्लेशियर प्रणाली पर एक हिमनद झील विस्फोट से ल्हेन्डे खोला घाटी में एक छोटी लेकिन विनाशकारी बाढ़ आई थी। इसने रसुवागढ़ी में नेपाल-चीन मैत्री पुल को नष्ट कर दिया था और 70 मिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक का आर्थिक नुकसान पहुंचाया था, हालांकि इसमें मौतें बहुत कम हुई थीं। सितंबर 2024 में, एक असंबद्ध मानसूनी बाढ़ और भूस्खलन ने काठमांडू और पूर्वी नेपाल को प्रभावित किया था, जिसमें कम से कम 224 लोग मारे गए थे और 25 पुलों व 11 जलविद्युत स्टेशनों को नुकसान पहुंचा था। अतीत में देखें तो, 1981 में इसी सीमा क्षेत्र में सिरेनमाको हिमनद झील के फटने से 200 से अधिक लोग मारे गए थे, मूल मैत्री पुल नष्ट हो गया था और सुनकोशी जलविद्युत स्टेशन क्षतिग्रस्त हो गया था। नेपाल के बाहर, इसकी तुलना फरवरी 2021 में भारत के उत्तराखंड राज्य में आई चमोली बाढ़ से की जा सकती है, जहाँ बर्फ और चट्टान के भूस्खलन ने 70 से अधिक लोगों की जान ले ली थी और 134 लोगों को लापता कर दिया था। ये घटनाएं दर्शाती हैं कि यह हिमालयी गलियारा पिछले साढ़े चार दशकों से लगातार और गंभीर हिमनद आपदाओं का सामना कर रहा है।

जलवायु परिवर्तन और हिमनद झील का जोखिम
 ICIMOD और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) के वैज्ञानिकों का कहना है कि इन आपदाओं की बढ़ती आवृत्ति का कारण जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना है। UNDP के शोध के अनुसार, नेपाल में 1970 के दशक से अब तक 26 हिमनद झील विस्फोट बाढ़ (GLOF) की घटनाएं दर्ज की गई हैं। शोधकर्ता वर्तमान में देश की 47 हिमनद झीलों को संभावित रूप से खतरनाक मानते हैं। हरित जलवायु कोष (Green Climate Fund) के सहयोग से नेपाल में 36 मिलियन डॉलर की परियोजना पहले से ही चल रही है ताकि उच्च प्राथमिकता वाली झीलों के जल स्तर को कम किया जा सके और पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित की जा सके। हालांकि, 26 अगस्त की यह आपदा किसी आधिकारिक तौर पर नामित उच्च जोखिम वाली झील के बजाय, एक अचानक ग्लेशियर ढहने और एक अस्थायी झील के बनने से शुरू हुई थी। यह दिखाता है कि विशाल और दुर्गम हिमालयी ग्लेशियर प्रणाली में हर खतरे की निगरानी करना कितना कठिन है।


(डॉ. हरिनारायण तिवारी, आईआईटी रुड़की से पीएचडी हैं और PANDT Soft Solutions के सीईओ हैं। उनकी कंपनी जल एवं बांध परियोजनाओं के क्षेत्र में परामर्श सेवाएं प्रदान करती है। प्रस्तुत विचार लेखक के पास उपलब्ध जानकारी के आधार पर व्यक्त किए गए हैं।)