675 शव, हजारों लापता, उजड़े घर और बहते बैंक—यह सिर्फ प्राकृतिक आपदा नहीं, हमारी तैयारी की परीक्षा हैभोटेकोशी का पानी इस बार केवल नदी के किनारों को नहीं लांघा, उसने नेपाल के हजारों परिवारों की जिंदगी की सीमाएं भी तोड़ दीं। रसुवा से लेकर नुवाकोट, धादिंग, गोरखा, तनहुँ, चितवन और नवलपरासी तक बाढ़ और भूस्खलन ने जो तस्वीर सामने रखी है, वह किसी भी संवेदनशील समाज की आत्मा को झकझोर देने के लिए पर्याप्त है। कहीं घर मलबे में बदल गए हैं, कहीं मां अपने बच्चे को खोज रही है और कहीं परिवार अपने प्रियजन की पहचान के लिए शवों की कतार में खड़ा है।सबसे पीड़ादायक तथ्य यह है कि सैकड़ों शव बरामद होने के बावजूद बड़ी संख्या में मृतकों की पहचान नहीं हो सकी है। शवगृह भर चुके हैं और कई शव खराब होने लगे हैं। संक्रमण के खतरे के कारण सरकार को डीएनए नमूने सुरक्षित रखकर अज्ञात शवों को जमीन में दफनाने की प्रक्रिया शुरू करनी पड़ी है। यह व्यवस्था प्रशासनिक मजबूरी हो सकती है, लेकिन इसके पीछे छिपा मानवीय दर्द शब्दों में बयान करना कठिन है।सोचिए, उस परिवार पर क्या बीत रही होगी जिसे यह भी पता नहीं कि उसका अपना व्यक्ति जीवित है या मृत। अंतिम दर्शन तो दूर, उसे अपने प्रियजन की कब्र तक नसीब नहीं। ऐसे समय में डीएनए नमूने सुरक्षित रखने का निर्णय जरूरी है, ताकि भविष्य में कोई परिवार अपने लापता सदस्य की पहचान कर सके। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या आपदा के बाद की ऐसी व्यवस्था पहले से तैयार नहीं होनी चाहिए थी?भोटेकोशी की त्रासदी ने आर्थिक व्यवस्था को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। रसुवा और नुवाकोट में 11 वाणिज्यिक बैंकों की 17 से अधिक शाखाएं तबाह हो गईं। करोड़ों-अरबों रुपये की जमा और ऋण प्रभावित हुए। बैंक के वॉल्ट और सेफ तक नदी में बह गए। यह दृश्य बताता है कि जब प्रकृति अपना रौद्र रूप धारण करती है तो मजबूत समझी जाने वाली आर्थिक संस्थाएं भी कितनी असुरक्षित हो सकती हैं।लेकिन सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न धन का नहीं, मानव जीवन का है। बैंक की शाखाएं फिर बनाई जा सकती हैं, सड़कें फिर बन सकती हैं, पुल फिर खड़े किए जा सकते हैं और आर्थिक नुकसान की भरपाई भी धीरे-धीरे हो सकती है। मगर जो जिंदगी चली गई, उसे वापस नहीं लाया जा सकता।इस त्रासदी के बीच चीन के तिब्बत क्षेत्र में विशाल झील टूटने की खबर ने एक नया खतरा पैदा कर दिया है। भोटेकोशी किनारे बसे लोगों के सामने अभी पहली आपदा का दर्द कम भी नहीं हुआ कि दूसरी बाढ़ ने आपदा की पीड़ा को बढ़ा दिया है। ऐसे समय में नदी के जलस्तर की लगातार निगरानी, समय पर चेतावनी और संवेदनशील बस्तियों को तत्काल सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाना सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।सरकार ने प्रभावित 15 स्थानीय निकायों को 6.75 करोड़ रुपये उपलब्ध कराकर राहत और बचाव अभियान को गति देने की कोशिश की है। यह स्वागत योग्य कदम है। लेकिन राहत राशि तभी सार्थक होगी जब वह जरूरतमंद तक समय पर पहुंचे। आपदा के समय फाइलों की गति नहीं, जमीन पर बचाव दल की गति मायने रखती है।
भोटेकोशी हमें एक कड़वा सबक दे रही है—
प्राकृतिक आपदाएं अचानक आती हैं, लेकिन उनसे होने वाली तबाही हमेशा अचानक नहीं होती। कमजोर तटबंध, असुरक्षित बस्तियां, अपर्याप्त पूर्व चेतावनी प्रणाली, नदी क्षेत्रों में अनियोजित निर्माण और आपदा के बाद शव प्रबंधन जैसी व्यवस्थाओं की कमी पहले से पहचानी जा सकती है।आज जरूरत केवल राहत बांटने की नहीं है। जरूरत है आपदा प्रबंधन की पूरी व्यवस्था पर गंभीर आत्ममंथन करने की। हिमालयी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियर झीलों, अचानक आने वाली बाढ़ और भूस्खलन के बढ़ते खतरे को देखते हुए नेपाल को दीर्घकालीन वैज्ञानिक आपदा नीति बनानी होगी।भोटेकोशी में बहा पानी लौटकर शायद फिर नदी में समा जाएगा, लेकिन जिन घरों में अब चूल्हा नहीं जलेगा, जिन माताओं की आंखें अपने बच्चों को खोजती रहेंगी और जिन परिवारों को अपने प्रियजनों की पहचान का इंतजार रहेगा—उनका दर्द वर्षों तक जीवित रहेगा।भोटेकोशी ने केवल नेपाल की जमीन नहीं डुबोई है, उसने हमसे एक सवाल पूछा है—क्या हम हर आपदा के बाद सिर्फ मृतकों की गिनती करेंगे, या अगली त्रासदी से पहले जिंदगी बचाने की तैयारी भी करेंगे?यही सवाल आज सरकार से भी है, समाज से भी और हम सब से भी।
भोटेकोशी का बहता पानी और इंसानियत की डूबती आवाज
675 शव, हजारों लापता, उजड़े घर और बहते बैंक—यह सिर्फ प्राकृतिक आपदा नहीं, हमारी तैयारी की परीक्षा है
परमात्मा प्रसाद उपाध्याय
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