भारत की अर्थव्यवस्था इस समय एक दिलचस्प मोड़ पर खड़ी है। एक तरफ आर्थिक विकास दर दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज बनी हुई है, दूसरी तरफ अगले दो दशकों की चुनौती आज की विकास दर से कहीं बड़ी लग रही है। अब सवाल केवल यह नहीं है कि भारत कितनी तेजी से बढ़ रहा है, बल्कि यह है कि क्या यह वृद्धि भारत को उच्च आय वाली अर्थव्यवस्था यानी अमीर देशों की श्रेणी तक पहुंचा पाएगी?

रिजर्व बैंक ने अगस्त की मौद्रिक नीति समीक्षा में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए वास्तविक जीडीपी वृद्धि का अनुमान 6.6 प्रतिशत से बढ़ाकर 6.7 प्रतिशत कर दिया है। रिजर्व बैंक के अनुसार, घरेलू मांग की मजबूती, बुनियादी ढांचे पर लगातार खर्च और विनिर्माण तथा सेवा क्षेत्र का विस्तार अर्थव्यवस्था को सहारा दे रहे हैं। हालांकि पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक ऊर्जा कीमतों में अस्थिरता को उसने प्रमुख जोखिम माना है। रिजर्व बैंक की अनुमानित 6.7 प्रतिशत की वृद्धि मजबूत तो है, लेकिन भारत की वास्तविक चुनौती इससे कहीं बड़ी है।

विश्व बैंक के अनुसार, भारत को 2047 तक उच्च आय की स्थिति हासिल करने के लिए अगले 22 वर्षों में औसतन 7.8 प्रतिशत की वास्तविक वृद्धि बनाए रखनी होगी। विश्व बैंक का आकलन है कि इसके लिए निवेश दर को 2035 तक जीडीपी के 40 प्रतिशत तक बढ़ाना होगा, जो अभी जीडीपर के करीब 33.5 प्रतिशत पर है। श्रमबल भागीदारी को 56.4 प्रतिशत से बढ़ाकर 65 प्रतिशत से ऊपर ले जाना और उत्पादकता वृद्धि को तेज करना भी जरूरी होगा। यदि भारत ऐसा कर पाने में विफल रहता है, फिर देश के सामने मिडिल इनकम ट्रैप में फंसने का खतरा है। विश्व बैंक के अनुसार, अनेक देश निम्न आय से निकलकर मध्य आय तक तो पहुंच जाते हैं, लेकिन उसके बाद उनकी वृद्धि धीमी पड़ जाती है। 1990 के बाद केवल 34 मध्य-आय अर्थव्यवस्थाएं उच्च आय वाली अर्थव्यवस्था बन सकी हैं। विश्व बैंक के अनुसार, मध्य आय वाले देशों में प्रति व्यक्ति आय का स्तर 1970 से अब तक अमेरिकी स्तर के 10 प्रतिशत से ऊपर नहीं जा पाया है। इसका मतलब यह है कि पुराने विकास मॉडल को हमेशा दोहराकर भारत आगे नहीं बढ़ सकता। विश्व बैंक के मुताबिक निम्न-मध्य आय वाले देशों को निवेश के साथ विदेश से आधुनिक तकनीक और बेहतर कारोबारी तौर-तरीके अपनाने चाहिए, जबकि उच्च-मध्य आय के करीब पहुंचने पर नवाचार को विकास का प्रमुख आधार बनाना पड़ता है। इसे विश्व बैंक ने निवेश, तकनीक के प्रसार और नवाचार की क्रमिक 3I रणनीति के रूप में रखा है।

१.     निवेश (Investment - 1i चरण): निम्न आय वाले देश केवल पूंजी निवेश, बुनियादी ढाँचे और भौतिक संसाधनों को बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करते हैं।

२.     तकनीक का प्रसार (Infusion - 2i चरण): निम्न-मध्यम आय वाले देश निवेश के साथ-साथ विदेशों से आधुनिक तकनीकों और व्यावसायिक तौर-तरीकों को अपनाकर देश भर में उनका प्रसार करते हैं।

३.     नवाचार (Innovation - 3i चरण): उच्च-मध्यम आय वाले देश निवेश और तकनीक के साथ स्वदेशी क्षमताओं का विकास करते हैं, जिससे वे खुद वैश्विक स्तर पर नए आविष्कार और नवाचार करने वाले बन जाते हैं।

विश्व बैंक की 3I रणनीति (3i Strategy) विकासशील देशों को 'मध्यम आय के जाल' (Middle-Income Trap) से बाहर निकालकर उच्च आय वाले देशों की श्रेणी में पहुँचने के लिए दी गई एक क्रमिक नीति है। इसे World Bank की 'विश्व विकास रिपोर्ट 2024' में पेश किया गया है।

 

भारत की सबसे बड़ी समस्या यहां उत्पादकता और रोजगार की है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुसार, भारत में सेवाओं की उत्पादकता तेजी से बढ़ी है, लेकिन विनिर्माण क्षेत्र में उत्पादकता वृद्धि कमजोर रही है और कृषि में अभी भी 40 प्रतिशत से अधिक कार्यबल लगा हुआ है। आईएमएफ के मुताबिक, कृषि में समान शिक्षा स्तर वाले एक अतिरिक्त कर्मचारी की तुलना में सेवा क्षेत्र का कर्मचारी चार गुना से अधिक उत्पादन करता है। भारत को इसलिए केवल जीडीपी बढ़ाने की नहीं, काम की संरचना बदलने की जरूरत है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, कृषि और इससे जुड़ी गतिविधियां राष्ट्रीय आय में करीब 20 प्रतिशत का योगदान देती हैं, लेकिन इसमें देश के पूरे कार्यबल का 46.1 प्रतिशत हिस्सा लगा हुआ है। मतलब चुनौती गंभीर है और इस चुनौती से पार पाने के लिए भारत के पास समय भी सीमित है।

आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, भारत का जनसांख्यिकीय लाभांश लगभग 2030 के आसपास चरम पर पहुंच सकता है, जब 15-59 वर्ष आयु वर्ग की आबादी करीब 65 प्रतिशत होगी। जनसांख्यिकीय लाभांश वैसी स्थिति को कहते हैं, जब जनसंख्या में कामकाजी लोगों का हिस्सा 50 प्रतिशत से अधिक होता है। 2030 के बाद यह स्थिति बदलने लगेगी, जिसके संकेत पहले ही दिखने लगे हैं। देश में प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर से नीचे जा चुकी है। यदि प्रजनन दर 2 पर रहे, तब आबादी स्थिर रहती है। लेकिन भारत में यह 2 से नीचे आ चुकी है। मतलब भारत की आबादी अब ढलान का रास्ता पकड़ रही है। आधुनिक विज्ञान और चिकित्सा से जीवन प्रत्याशा यानी आम लोगों की उम्र बढ़ रही है। ये दोनों तथ्य जो तस्वीर सामने लाते हैं, वह बहुत चिंताजनक है। प्रजनन दर कम होने का अर्थ युवा आबादी की वृद्धि घट जाना है और जीवन प्रत्याशा बढ़ने का अर्थ वृद्ध आबादी का बढ़ जाना है। साफ है कि देश में आगे वृद्ध आबादी का दबाव तेजी से बढ़ेगा। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष के अनुसार, 60 वर्ष और उससे अधिक आयु के भारतीयों की संख्या 2050 तक करीब 34-35 करोड़ तक पहुंच सकती है, यानी कुल आबादी का लगभग 20-21 प्रतिशत। 2022 से 2050 के बीच 80 वर्ष से अधिक आयु की आबादी में करीब 279 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान है। इसका अर्थ केवल पेंशन और स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ना नहीं है। कार्यशील आबादी का अनुपात घटने पर प्रत्येक कामकाजी व्यक्ति पर आश्रित आबादी का बोझ बढ़ सकता है। इसलिए आज शिक्षा, स्वास्थ्य, महिलाओं की रोजगार भागीदारी, कौशल और उत्पादकता में किया गया निवेश भविष्य के वृद्ध भारत की आर्थिक क्षमता तय करेगा। मतलब अभी जो जनसंख्या लाभांश देने की स्थिति में है, यदि समय रहते उसका भरपूर लाभ नहीं उठाया गया, वही जनसंख्या अर्थव्यवस्था की सड़क पर गतिरोधक बन सकती है। देश के संभावनाएं असीम हैं, लेकिन खतरे भी कम नहीं हैं।