कांग्रेस संस्थापन पक्ष ने तीन असोज से वडा अधिवेशन शुरू कर 16 से 19 असोज के बीच केंद्रीय महाधिवेशन कराने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई है। इसके जवाब में देउवा खेमे ने 15 असोज से वडा अधिवेशन और 21 से 23 असोज के बीच अलग केंद्रीय महाधिवेशन कराने का कार्यक्रम सार्वजनिक किया है। दो समानांतर अधिवेशन की संभावना से पार्टी विभाजन की आशंका गहरा गई है।
इसी बीच केंद्रीय कार्यसम्पादन समिति ने देउवा पक्ष की आठ सूत्री मांगों को संबोधित करने की प्रतिबद्धता जताई है। साथ ही तत्कालीन पदाधिकारी और सदस्यों से वर्तमान केंद्रीय कार्यसमिति में समायोजित होने का आग्रह किया गया है।
पूर्णबहादुर खड्का संस्थापन पक्ष के करीबदेउवा खेमे के तत्कालीन कार्यवाहक सभापति पूर्णबहादुर खड्का भी अब संस्थापन पक्ष के करीब आते दिख रहे हैं। आठ सूत्री मांगों के समाधान की प्रतिबद्धता के बाद उन्होंने अपने निकट नेताओं से तीन असोज से शुरू होने वाली महाधिवेशन प्रक्रिया में शामिल होने का आग्रह किया है।
अदालत में विचाराधीन पुनरावलोकन मामले के कारण खड्का स्वयं तत्काल सानेपा पहुंचने से बच रहे हैं। उनके करीबी नेता रामहरि खतिवडा के अनुसार, खड्का के साथ रहने वाले कई नेता केंद्रीय कार्यसमिति में समायोजन के लिए तैयार हैं।
31 नेताओं ने जारी की संयुक्त विज्ञप्तिशनिवार को देउवा और खड्का खेमे से जुड़े 31 नेताओं ने पार्टी एकता के पक्ष में संयुक्त विज्ञप्ति जारी की। इनमें महालक्ष्मी उपाध्याय ‘डिना’, गंडकी के मुख्यमंत्री सुरेन्द्र पाण्डे, बागमती के पूर्व मुख्यमंत्री इन्द्रबहादुर बानियाँ, जीवनबहादुर शाही, श्याम घिमिरे, मीनबहादुर विश्वकर्मा, रामहरि खतिवडा और नैनसिंह महर सहित कई नेता शामिल हैं।
नेता श्याम घिमिरे के मुताबिक, विज्ञप्ति पर हस्ताक्षर करने वालों में से अधिकांश केंद्रीय कार्यसमिति में शामिल होने के लिए तैयार हैं। संपर्क में आने वाले अन्य नेताओं को मिलाकर यह संख्या करीब 40 तक पहुंच सकती है।
देउवा की शर्त बरकरार
देउवा पक्ष ने 14वें महाधिवेशन से निर्वाचित सभापति के नेतृत्व में ही अगला महाधिवेशन कराने की मांग दोहराई है। नेता एनपी साउद का कहना है कि सर्वोच्च अदालत द्वारा पुनरावलोकन की अनुमति दिए जाने के बाद परिस्थितियां बदल गई हैं। उन्होंने संवाद के जरिए सहमति बनाने की जरूरत बताई।शेखर कोइराला खेमे ने भी तीन असोज से शुरू होने वाली प्रक्रिया से दूरी का संकेत दिया है। नेता सञ्जय गौतम ने कहा कि वे इस अधिवेशन में शामिल नहीं होंगे। कांग्रेस में विवाद अब नेतृत्व, वैधानिकता और संगठनात्मक शक्ति-संतुलन की लड़ाई बन गया है।
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