राजविराज।नेपालI जिस उम्र में बच्चे पिता का हाथ पकड़कर स्कूल जाते हैं, 13 वर्षीय शोभाकुमार सदा उस उम्र में पिता का फोन मिलाकर उनके लौटने की खबर तलाश रहा है। 27 दिन से फोन नहीं लग रहा। भोटेकोशी की विनाशकारी बाढ़ के बाद उसके पिता बेचन सदा लापता हैं। घर में कमाई का कोई जरिया नहीं और मां को गुजरे अभी एक साल भी नहीं हुआ।बारिश होती है तो शोभा की चिंता और बढ़ जाती है। बोरिया स्थित उनके टिन के घर की छत जगह-जगह से टपकती है। वह कभी बर्तन खिसकाता है, कभी सामान बचाता है और फिर सात साल की बहन विभा को देखता है। पिता की अनुपस्थिति में छोटी बहन की जिम्मेदारी भी अब उसी के कंधों पर है।फिर वह मोबाइल उठाता है।पिता का नंबर डायल करता है।फोन नहीं लगता।“अभी भी बार-बार फोन करता रहता हूं, लेकिन लगता ही नहीं,” शोभा कहते हैं। इस एक वाक्य में 27 दिनों का इंतजार और एक बच्चे की बेबसी समाई है।मां का इलाज नहीं करा सके, अब पिता का इंतजारशोभा की मां फुलियादेवी कैंसर से पीड़ित थीं। 42 वर्ष की उम्र में पिछले कात्तिक में उनकी मौत हो गई। इलाज के लिए उन्हें धरान के बीपी कोइराला स्वास्थ्य विज्ञान प्रतिष्ठान ले जाया गया था। डॉक्टरों ने आगे इलाज के लिए भरतपुर कैंसर अस्पताल ले जाने की सलाह दी, लेकिन परिवार के पास पैसे नहीं थे।इलाज और आने-जाने में एक लाख रुपये से ज्यादा खर्च हो चुके थे। कर्ज लेकर भी परिवार आगे का इलाज नहीं करा सका। मां घर लौटीं और वहीं उनकी मौत हो गई।मां की मौत के बाद परिवार का एकमात्र कमाने वाला सहारा पिता थे।बेचन मां के इलाज और बेटियों की शादी में लिया कर्ज चुकाने के लिए जेठ में रसुवा गए। 45 वर्षीय बेचन त्रिशूली-3 ‘बी’ जलविद्युत परियोजना में मजदूरी करते थे। 10 भदौ की बाढ़ के बाद उनसे संपर्क टूट गया।अब करीब 69 हजार रुपये का कर्ज बाकी है।शोभा को यह रकम याद है। शायद इसलिए कि पिता के लौटने का इंतजार करते हुए उसे घर के खर्च और कर्ज दोनों का हिसाब समझना पड़ रहा है।दो बहनें आती हैं, मगर मजबूर हैंशोभा की दो बड़ी बहनें हीरा और किरण शादी के बाद अपने-अपने घर में हैं। दोनों बारी-बारी से आकर भाई-बहन की देखभाल करती हैं। लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति भी कमजोर है।हीरा कहती हैं, “भाई-बहन की चिंता में अभी लौट नहीं पा रही हूं, लेकिन हमेशा यहां रहना भी संभव नहीं है।”बारिश में टिन की छत से पानी टपकता है। घर में खाना बनाना और सोना तक मुश्किल हो जाता है। फिर भी परिवार के पास दूसरी जगह नहीं।“जाने के लिए कोई जगह नहीं है। जैसे भी हो, यहीं रहना है,” शोभा कहते हैं।अब तलाश से ज्यादा पहचान का इंतजारबेचन के साथ उसी गांव के 28 वर्षीय सुरेंद्र सदा और 30 वर्षीय शिवकुमार सदा भी रसुवा गए थे। दोनों भी लापता हैं। परिजन बेत्रावती तक उनकी तलाश में पहुंचे, लेकिन परियोजना स्थल तक नहीं जा सके। कई दिनों की खोज के बाद उन्हें लौटना पड़ा।तीनों परिवारों ने डीएनए जांच के लिए रक्त के नमूने दिए हैं। अब उनकी उम्मीद सरकारी तलाश और पहचान की प्रक्रिया पर टिकी है।शोभा के पास फिलहाल पिता का नंबर है। एक छोटी बहन है। मां की याद है। सिर पर कर्ज है और ऊपर टपकती छत।फिर भी हर बार मोबाइल की स्क्रीन देखते हुए शायद उसके मन में वही उम्मीद उठती है—आज शायद पिता का फोन आ जाए।भोटेकोशी की बाढ़ ने बेचन को लापता किया है, लेकिन उसके साथ एक 13 साल के बच्चे का बचपन भी जैसे कहीं पीछे छूट गया है।